Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar the Inspiring Journey of India’s Greatest Champion of Equality 3

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Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar साल 1901, ब्रिटिश इंडिया की बॉंबे प्रेसिडेंसी में एक 10 साल का लड़का अपने भाई बेहनों के साथ मसूर रेल्वे स्टेशन पर पूछता है सब चले गए तुम लोग यहां क्यों खड़े हो इस पर वो दस साल का लड़का जवाब देता है कि उन्हें कोरे गाउ जाना है और वो अपने पिता या उनके चपराजी के आने का वेट कर रहे हिन तभी उसे बातों ही बातों में पता चलता है कि ये बच्चे untouchable मानी जाने वाली महार जाती से belong करते हैं। उसके चेहरे के हाव भाव तुरंत बदल जाते हैं। मुस्कान गायब हो जाती है और वो सीधे मुड़ता है और उन्हें ignore करके तुरंत वापस अपने cabin में चला जाता है।

जैसे कि वो बच्चे वहाँ थे ही नहीं। इसके बाद एक एक करके बैलगारी वाले भी उन्हें ले जाने से मना कर देते हैं। सिर्फ उनकी जाती की बज़व से कोई भी उन्हें ले जाने से मना कर देते हैं। सिर्फ उनकी जाती की बज़ह से कोई भी उन्हें बिठाने को तैयार नहीं होता।

आखर में एक गाडी वाला इस बात पर राजी हुआ कि वो दोगुने पैसे लेगा लेकिन बैलगाडी वो नहीं चलाएगा। मजबूरी में उस लड़के और उसके भाई बहनों को ही बैलगाडी चलानी पड़े। एक तरफ रात बढ़ रही थी और दूसरी और उन बच्चों का प्यास से गला सूख रहा था। उस दस साल के लड़के ने जब रास्ते में एक जोपडी देखी तो पानी लेने के लिए उतर गया।

लेकिन तभी बैलगाडी वाले ने उससे कहा, चुंगी वाला हिंदू है, वो महारों को पानी नहीं देगा। लेकिन अगर तुम उससे ये कहते हो कि तुम मुसल्मान हो तो शायद पानी मिल जाए। उस लड़के ने चुंगी वाले से पानी मांगा और पूछने पर खुद को मुसल्मान बताया। लेकिन शायद चुंगी वाले को आभास हो गया था कि ये बच्चे सो कॉड लोवर कास्ट से है इसलिए उस लड़के को पानी नहीं मिल सका। उस बच्चे के लिए ये अपमान पहली बार नहीं था। स्कूल में भी उसे हर रोज अपमान भरी नजरों से देखा जाता था।

उसके क्लासमेट्स को उसके साथ बैठना तो दूर उसे चूना तक गवारा नहीं था. हाल ये था कि उसे क्लास में सबसे अलग एक बोरे पर बैठना पड़ता जिसे सफाई करने वाला भी नहीं चूता था. लेकिन उस वक्त किसी को कहा पता था कि यही लड़का आगे चल कर बैकवर्ड्स और दलित्स की वो आवासगा। आज जब किसी पर जुल्म होता है, जब किसी के हक छीने जाते हैं, तो उसी के लिखे संविधान से नियाय मिलता है। जिसे अचूत कहे कर समाच ने ठुकरा दिया थारत के पहले लॉम मिनिस्टर और इंडियन कॉंसिटूशन के आर्किटेक्ट डॉक्टर भीमराओ रामजी अमबेटकर की,

Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar भारतीय संविधान निर्माता
भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव अंबेडकर

जिन्होंने कास डिस्क्रिमिनेशन की दिवार को सिर्फ चुनौती ही नहीं दी, बलकि उसे तर्क, शिक्षा और संविधान की हतियार से तोड़ डाला. डॉक्टर भीमराओ रामजी अमबेटकर का चनम 14 एप्रेल 1891 को मद्यप्रदेश के महु में हुआ था वो अपने माता पिता रामजी मालोजी सकपाल और भीमा बाय की चौदवी और आखरी संतान थे उनका परिवार उस समय की हिंदू सुसाइटी में अंटचेबल मानी जाने वाली महार जाती से था जो महराश्ट के रतनागरी जिले के आमडवे गाउ के रहने वाले थे भीम राव के पूर्वज लंबे समय से बृतिश इस्ट इंडिया कंपनी की सेना में सेवा करते आ रहे गए इतने बड़े परिवार का गुजारा उनकी पेंशन से नहीं हो पा रहा था इसलिए भीमराव का बाकी

परिवार तो सतारा में ही रहा लेकिन उनके पिता कोरे गाउ में एक कैशिर की जॉब करने लगे जब भीमराव स्कूल में पढ़ने गए तो उन्हें यहां उस चुनौती का सामना करना पड़ा जिसका दंच सेखडू पीडियों से उनके समाज को जेलना पढ़ रहा था स्कूल में महार जाती का होने के कारण उनके साथ इन ह्यूमेन डिस्क्रिमिनेशन होने लगा। क्लास में उन्हें बाकी बच्चों के साथ बैटने की परमीशन नहीं थी।

स्कूल में अपने साथ वो एक बोरा लेकर आते थे जिसे सफाई करने वाला भी नहीं चूता था। हद तो ये थी कि वो खुद घड़े से पानी निकाल कर नहीं पी सकते थे। एक चपरासी उन्हें घड़े से पानी निकाल कर देता था और अगर चपरासी ना हो तो उन्हें प्यासा ही रहना पड़ता।

यहां तक कि धोबी भी उनके कपड़े नहीं धोते थे उस दोरान या पंग मानसिकता आम थी कि इस बिरादरी के लोगों के चूने से कोई अपवित्र हो जाएगा सेखडो सालों से समाज की आखों पर बंधी भेदभाव की इस पट्टी ने पूरी मानफता को खोखला बना रखा था इस तरह सोसाइटी ने बच्चपन से ही भीम राव को खुद से अलग महसूस कराया

हाला कि स्कूल में सभी लोग इतने क्रू�न से ही भीम राव को खुण में उनके सर से मा का सिया जब वो सिर्फ छे साल के थे तबी बिमारी के चलते उनकी मा की डेथ हो गई और चायल हुण में ही उनके सर से मा का साया उठ गया इसके बाद उनकी बुआ मीरा बाई ने बच्चों की जिम्मेदारी समभाली जब वो सिर्फ दस साल के थे तब उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली पिता के इस कदम से भीमराव बेहद नाराज हुए इसलिए उन्होंने घर से भाग कर बंबई जाने का फैसला किया जहां उनके कुछ जानने वाले मिल में नौकरी किया करते थे। बंबई जाने के लिए पैसों की जरूरत थी इसलिए उन्होंने अपनी बुआ के वॉलिट से पैसे चुराने की कोशिश की।

लगतार तीन रातों तक कोशिश करने के बाद जब बुआ का वॉलिट हाथ लगा तो उसमें सिर्फ आधा आना निकला। उन्हें अपनी बुआ की ऐसी हालत पर तरस और अपनी हरकत पर बहुत शर्मा आई। वो जहां अपने पिता की दूसरी शादी से नारास थे तो वही समाज के जाती गत भेदभाव ने उन्हें अंदर तकमेशा के लिए बदल गई। वो पढ़ाई में इतने होशियार हो गए कि टीचर उनकी तारीफ करते नहीं ठकते थे। ऐसे में टीचर ने अम्बेडकर के पिता से उन्हें बेस्ट एजुकेशन दिलवाने की रिक्वेस्ट की। इसके बाद उनके पिता उनके आगे के एजुकेशन और बहतर फ्यूचर की तलाश में अपने परिवार के साथ बॉम्बे आकर बस गए। यहां वो गरीबों की एक बस्ती में एक छोटे से कमरे में रहते थे। लेकिन उनके पिता ने उनकी पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी।

Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar Life Story in Hindi: Untouchability से संविधान तक

उनका एडमिशन बॉंबे के सबसे अच्छे एलफिन स्टून हाई स्कूल में करवाया गया। लेकिन यहां भी छुआ छूत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन्हें संस्कृत पढ़ने से सिर्फ इसलिए रोग दिया गया क्योंकि वो अंटचेबल माने जाने वाली जाती से थे। उन्हें हमेशा लगता कि गाओ से शहर आकर भी समाज नहीं बदला है। लेकिन इस सब के बावजूद वो पूरी मेहनत से पढ़ाई में लगे रहे और साल 1907 में भीम राव ने मैट्रिक्यूलेशन की परीक्षा पास कर ली अपनी कम्यूनिटी से वो ऐसा करने वाले पहले इंसान थे उस समय अर्ली मैरेजिस काफी कॉमन थी इसलिए 15 साल की उम्र में ही भीम राव की शादी कर दी गई उनकी पतनी रमाबाई उस

समय सिर्फ 9 साल की थी भले ही भीम राव की जिंदगी हजारों संघर्षों से भरी हुई थी लेकिन उनकी पतनी रमाबाई उनका सबसे बड़ा सहारा च जुटाने में मदद करती थी। भीम राव भी उनका इतना सम्मान करते थे कि वो उन्हें पूजनी अमानते थे। भीम राव ने ऐसे ही कश्टों से जूचते हुए इंटरमीडियेट की परीक्षा भी पास कर ली। लेकिन आगे हायर एजुकेशन जारी रखने के लिए काफी पैसा चाहिए था। जिसका इंतिजाम करना उनके लिए खुद से संभव नहीं था। लेकिन भीम राव इतने काबिल स्टूडेंट थे कि उनके कई वैल्विशर्स उन्हें आगे बढ़ते हुए देखना चाहते थे। उनमें से ही एक well-wisher के जरिये बड़ोदा के गायकवार किंग

सायाजी राउ गायकवार थ्री ने भीमराउ को higher education के लिए monthly scholarship ग्रांड कर दी। जिसके चलते भीमराउ 1912 में बॉंबी उनिवर्स्टी से economics and political science में BA की degree हासल करते हैं। भीमराउ ने अपने सपनों को उडान देना शुरू ही किया था कि इस बीच उनके पिता की तब्यत बेहत खराब हो गई और कुछ समय बाद उनके सर से पिता का साया भी एक स्कीम शुरू की जिसके तहट कुछ आउटस्टैंडिंग स्कॉलर्स को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भेजा जाना था।

 

भीमराव का भी इसमें सेलेक्शन हो गया लेकिन उनके सामने एक शर्त रखी गई कि उन्हें विदेश से पढ़ाई पूरी करने के बाद 10 साल तक बढ़ोदा स्टेट में सर्विस करनी होगी। उन्होंने इसे एकसेप्ट कर लिया और 1913 में वो अमारिका पहुँच कर कोलंगिया युनिवर्स्टी में पढ़ाई करने लगे। यहाँ पर फ्रीडम और इकॉलिटी ने उनकी लाइफ को रीशेप किया। यहाँ कोई उनकी कास के बेसिस पर उन्हें जज नहीं करता था। यूनिवर्स्टी में उनके में सब्जेक्ट्स एकनॉमिक्स औरनलिटिकल स्टडी टॉपिक पर पीएशडी थीसिस भी कमप्लीट कर ली और वो पीएशडी होल्डर बन गए इकनॉमिक्स में फॉरेंड से डिग्री लेने वाले वो पहले इंडियन थे

लेकिन अमबेट कर इतने पर भी नहीं रुके इसके बाद वो इंग्लेंड चले गए जहां उन्होंने लंडन स्कूल आफ इकनॉमिक्स को जॉइन किया लेकिन यहां कोड्स पूरा करने से पहले ही उन्हें जून 1917 में भारत वापस लोटना पड़ता है क्योंकि उस समय तक 1914 में शुरू हुआ फर्स्ट वर्ल्ड वार चरम पर पहुँच चुका था और उन्हें बरोडा स्टेट दुआरा मिली स्कॉलर्शिब भी एक्सपायर हो गई थी भारत लोटने के बाद शर्ट के अनुसार भीमराव अम्बेटकर को स्टेट अफ बरोडा को सर्व करना था इसलिए उनकी काबिलियत के दम पर उन्हें गाईकुआर्ट्स अफ बरोडा का मिलिटरी सेक्रिटरी अपॉइंट किया वाला कोई भी उन्हें फाइल्स या पेपर सीधे हात

में नहीं देता था। नौकर भी उनके डेस्क पर फाइले फैक कर जाते थे और उन्हें पीने के लिए पानी तक नहीं दिया जाता था। सिर्फ उनकी जाती की वज़र से उनकी काबिलियत और शिक्षा का कोई सम्मान नहीं था। रहने के लिए उन्हें एक होटेल से दूसरे होटेल भटकना पड़ता क्योंकि कोई भी उन्हें कमरा देने को तयार नहीं था। आखिर में उन्होंने अपनी जाती चिपाने का फैसला किया और एक पार्सी गेस्ट हाउस में रहने लगे भीमराव को उमीद थी कि अपनी नौकरी के जरिये उन्हें कही और रहने की जगह मिल जाएगी लेकिन इससे पहले कि वो ऐसा कुछ कर पाते एक सुभा जब वे काम के लिए निकल रहे थे तो कुछ लोग लाठियां लेकर उनके कमरे के बाहर आ गए उन्होंने उन पर होटल को अपवित्र करने का आरोप लगाया और उन्हें शाम तक वहां से निकल जाने की धमकी दी।

भीमराव पूरी तरह से निराश और अपमानत महसूस कर रहे थे। ये घटना उनके जीवन के सबसे दर्दनाक अनुभवों में से एक बन गई। उन्होंने तै किया कि वो इस भद्धी विवस्था को अबॉलिश करके ही रहेंगे। सिर्फ ग्यारा दिन नौकरी करने के बाद वो वापस मुंबई लोट गए और दूसी नौकरी तलाशने लगे। उन्होंने कभी एक प्राइविट ट्यूटर, कभी एक अकाउंटेंट, तो कभी इंवेस्ट्मेंट कंसल्टेंट के रूप में काम किया। लेकिन ये सब तब फेल होता गया जब उनके क्लाइंट्स को पता चला कि वो तथा कथित अंटचेबल मानी जाने वाली छोटी जाती से हैं। इस तरह हर रोज भीमराव अम्बेटकर को इस जातिगत भेदभाव के कांटों से गुजरना पड़ता। लेकिन उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी और जल्द ही वो मुंबई के सिदिनहम कॉलेज में पॉलिटिकल इकनॉमी

के प्रोफेसर बन गए। इसके साथ ही वो खुलकर पब्लिक ग्यादरिंग्स में भी पार्टिसिपेट करने लगे जिससे उनकी एक लीडर के तौर पर पहचान बननी शुरू हो गई। अब तक वो जान चुके थे कि खामोश रहने से अत्याचार या भेदभाव नहीं मिटाया जा सकता। अंटचेबल्स की बात रखने के लिए डॉक्टर बी आर अम्बेटकर को गवर्मेंट ओफ इंडिया आक्ट नाइटीन नाइटीन के लिए सुझाव देने वाली साउथ बोरो कमिटी मीटिंग में भी बुलाया गया। इस दोरान अम्बेटकर ने दलित्स और अदर रिलीजियस कमिटीज के लिए सेपरेट एलेक्टरेट्स और ह�र मूकनाय की भी शुरुवात की जिसमें छुआछुद की परमपरा का उन्होंने जम कर विरोध किया और ये पेपर अंटचेबल मानी जाने वाली कास की आवास बन गई

इस पेपर के एक आर्टिकल में उन्होंने लिखा हमें सिर्फ आजाद भरत नहीं चाहिए बलकि सब को रिलीजियस, सोशल, एकनॉमिक और पॉलिटिकल इकॉलिटी के स्वराज भी गुलामी के समान ही होगा। वो चाहते थे दलितों को ये विश्वास मिले कि उनका सित्व किसी की दया पर नहीं बलकि उनके अधिकारों पर टिका है। अपने इनी विचारों के चलते वो काफी पॉपिलर हो चुके थे लेकिन अब भी उनके अंदर और नौलिज हासल करने की प्यास बाकी थी। वो मानते थे कि एजुकेशन ही वो हतियार है जो समाज से बुराई को मिटा सकती है। यही वज़व थी कि आगे और पढ़ने के लिए कुछ लोन और कुछ दोस्तों की मदद से

वो 1920 में फिर से लंडन पहुँच गए। यहां उन्होंने लंडन स्कूल आफ एकनॉमिक्स और ग्रेज इन से अपनी बाकी के एजुकेशन कम्प्लीट की। उन्हें बरिस्टर एट लॉर डिग्री मिलने के बाद बृतिश बार में बरिस्टर के रूप में एंट्री भी मिल गई। एजुकेशन को लेकर वो इतने जादा पैशनिट थे कि उन्होंने दर्जनों बड़ी डिग्रिया हासल की जिन में से चार तो केवल डॉक्टूरल डिग्रीज ही थी लेकिन इतनी उची डिग्रिया हासल करने के बाद भी उन्हें पैसों की तंगी का सामना करना पड़ा एप्रिल 1923 में जब वो भारत वापस आये तो उन्होंने एक बेरिस्टर के तौर पर काम करने का फैसला किया लेकिन उनकी इकनॉमिक कंडिशन इतनी खराब थी कि उनके पास वकालत करने के लिए लाइसन्स लेने तक के पैसे नटिस के दोरान डॉक्टर अम्बेट कर अंटचिबल मानी जाने वाली जातियों को एजुकेट करने और उनके अपलिफ्मिंट के लिए मूकनाय के साथ साथ भाईशकृत भारत, समता, प्रबुद्ध भारत और जनिता नाम की मैगजीन्स भी पबलिश करने लगे।

इन मैगजीन्स के अलावा वो लगातार जन सभावों में हिस्सा लेते रहे जिसके चलते उनकी बात देश भर में सुनी जाने लगी। वो जल्दी दलितों के एक बड़े नेता के तौर पर उभर के सामने आने लगे। उनकी बढ़ती पॉपुलेरिटी के बारे में बृतिश सरकार भी अच्छे से जानती थी। इसलिए साल 1926 में बंबई के गवर्नर ने उन्हें बॉंबे लेजिस्लेटिव काउंसल के मेंबर के रूप में नॉमिनेट कर दिया। उस समय बंबई की महाद म्यूनिसिपलिटी में एक चवदार टैंक था जिसके पानी को दलित लोग हात भी नहीं लगा सकते थे। इस मामलले को जब बॉंबे लेजिसलेटिफ काउंसल में उठाया गया तो सरकार ने दलितों के हक की बात मान ली। कागजों में

तो उन्हें यहां से पानी भरने का दिकार मिल गया था लेकिन जमीनी हकीक�े बात सिर्फ पानी की नहीं बलकि हमारे आत्मसम्मान की है। इसके बाद हजारों लोगों की भीड के साथ चवदार टैंक पहुँचकर उन्होंने वहां से पानी पिया। इससे गाउ के तथा कथित उंची जाती के लोग गुस्से से आग बबूला हो गए और उन्होंने लाठी डंडो से कई दलितों को बहाँ पीटा। इस घटना ने देश भर में सुर्खिया बटोरी और दलित आंदोलन की आग भड़क उठी। इस घटना के बाद अम्बेटकर महराश्ट्र और देश के कई हिस्सों में जन सभाय कर उची जातियों की शेष्टिता पर सवाल खड़े करके दलितों को एक जुट करने लगे।

एक सभा के दोरान उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथ मनुस्मिती को ये कहते हुए जला दिया कि ये दलितों के साथ सद्यों से होते आए भेदभाव के लिए जिम्मेदार है। अम्बेटकर के इस कदम ने भारतीय समाच को अंदर से छगजोर करक दिया। लेकिन डॉक्टर बी आर अम्बेटकर यही रुकने वाले नहीं थे। साल 1909 में मिंटो मोर्ले रीफॉर्म्स के तहद मुसल्मानों को सेपरेट इलेक्टॉरेट मिला था। जिसके चलते लेजिस्लेटिव काउंसल में मुसल्मानों की अलग सीटे थी और उन पर वोट भी सिर्फ मुसलिम ही कर सकते थे।

अम्बेटकर का मानना था कि दलितों को भी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए यही रास्ता अपनाना होगा। इसलिए साल 1928 में जब साइमिन कमिशन भारत आया तो उन्होंने साइमिन कमिशन के सामने मांग रखी कि दलित समाज को कुछ सीटों पर सेपरेट एलेक्टरेट का राइट मिलना चाहिए जिसमें सिर्फ दलितों को उनका नेता चुनने का अधिकार मिले। कॉंग्रेस के बड़े नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। साइमन कमिशन के खिलाफ उस वक्त देश भर में पहले से ही विरोध हो रहा था। लेकिन अम्बेटकर फिर भी इसके पक्ष में काम कर रहे थे। इसलिए उनके खिलाफ भी रोश भड़क उठा और उन्हें एक नैशनलिस्ट लीडर के बजाए सिर्फ दलितों के नेता के रूप में देखा जाने लगा। अम्बेटकर भी अपनी इमेज की परभा किये बिना अपने काम में लगे रहे। जब उन्हें लगा कि उन्हें नियाय नहीं मिल रहा है तो उन्होंने जातीवाद से तंग आकर

उन्निस्सुनतीस में जल गाउं की एक सभा में मंच से घड़े होकर एलान किया। अब ज्यादा दिन तक हिंदू बन कर इस समाज में नहीं रह जा सकता। हमें अगर इस गरीबी और दूरदशा से बाहर निकलना है तो कोई दूसरा धर्म अपनाना ही होगा। उनकी स्पीच से ऐसा असर हुआ कि कई महारों ने हिंदू धर्म छोड़ बौद धर्म को अपना लिया. इस बीच साल 1930 में साइमन कमिशन रिपोर्ट आई जिसका चारो तरफ विरोध हुआ. लेकिन भीमराव अमबेटकर इसका भी समर्थन कर रहे थे.

इसके बाद 1930 में ही लंडन में पहली राउंटेबल कॉंफरेंस हुई जिसमें अमबेटकर भी शामिल हुए. पहली बार इतने बड़े मंच पर दलितों की आवाज बनकर उनकी ही जाती से निकला कोई शक्स उनका रिप्रेजेंटेशन कर रहा था लेकिन इस राउंड टेबल कॉंफरेंस में महत्मा गांधी शामिल नहीं हुए क्योंकि वो साइमन कमिशन की रिपोर्ट से सहमत नहीं थे देश में उस वक्त तक जवारलाल नहरू, सरदार पटेल जैसे कई बड़े कॉंगरिसी नेता गांधी जी के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहे थे लेकिन भीमराव अम्बेडकर के विचार उनसे मेल नहीं खाते थे। गांधी जी के बुलावे पर डॉक्टर अम्बेटकर ने उनसे पहली बार 14 अगस्त 1931 को मुंबई के मन भवन में मुलाकात की।

महादमा गांधी ने उनसे कहा, मुझे पता चला है कि आपको मुझसे कई शिकायते हैं। इस पर अम्बेटकर बोले, गांधी जी मेरी कोई मातर भूमी नहीं है। कोई भी स्वाभिमानी दलित इस देश पर गर्व नहीं करेगा। मैं इस भूमी को अपनी मातर भूमी और इस धर्म को अपना कैसे कह सकता हूँ जहां हमारे साथ जानबरों से भी बुरा बिहेव किया जाता है। जहां हमें पीने के लिए पानी भी नहीं मिलता। इस पर महत्मा गांधी बड़े ही रूखे अंदाज में बोले, जब आप पैदा भी नहीं हुए थे, मैं तब से ही दलितों के साथ हो रहे भेदभाव और उनके अधिकारों के बारे में सोचता रहा हूँ।

लेकिन मुझे हरानी इस बात की है कि आप मुझे तब भी उनका हितेशी नहीं मानते हैं। गांधी जी ने आगे कहा मुझे इसे कॉंग्रिस के मंच का हिस्सा बनाने के लिए बहुत प्रयास करने पड़े। कॉंग्रिस ने दलित के सुधार पर कम से कम 20 लाग रुपए खर्च किये हैं। अम्बेटकर ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, गांधी जी फिर तो ये पैसा बेकार गया, क्योंकि इससे दलितों का कोई भी फैदा नहीं हुआ. इस तरह पहली ही मुलाकात से देश के दोनों बड़े नेताओं के बीच तना तनी की शुरुवात हो गई थी.

गांधी जी वही नेता थे जिन्होंने दलितों को हरीजन का टैटल दिया था, जिसका मतलब भगवान का सेवक होता है.

गांधी जी ने इस शब्द का यूज करके सोसाइटी से दलितों के प्रती भेदभाव को दूर करने और उन्हें समाज में इकोलिटी दिलाने का प्रयास किया था। लेकिन बाबा साहेब अम्बेटकर का मानना था कि दलितों के अधिकार के लिए कॉंग्रिस या गांधी जी पर डिपेंड नहीं हुआ जा सकता। इसलिए उन्होंने इसकी बागडोर अपने हाथों में ले रखी थी। इसके बाद 1931 में लंडन में एक और राउंटेबल कॉंफरेंस हुई जिसमें गांधी जी भी शामिल हुए यहाँ पर भी भीमराव अम्बेटकर ने दलेतो के लिए सेपरेट एलेक्टरेट की मांग रखी लेकिन गांधी जी उनके विचारों से बिलकुल भी सहमत नहीं थे उनका मानना था कि ऐसा करने से हिंदू समाज बट जाएगा हाला कि बृतिश सरकार अम्बेटकर के विचारों से सहमत थी इसलिए गांधी जी के विरोध के बावजूद बृतिश प्राइम मिनिस्टर रामसी मैकडोनल ने 1932 में कम्यूनिल अवार्ड की घोशना की जिसमें दलितो सहिद अन्य मैनोरिटीज के लिए सेपरेट एलेक्टरेट का प्रोवीजित लगातार बिगड़ने लगी जिससे देश के कई हिस्सों में भीमराव अम्बेटकर के पुतले जलाए जाने लगे और उन्हें डेथ थ्रेट्स मिलने लधिकार खत्म हो गया. इससे पहले British Communal Award ने दलितों को अलग वोटर लिस्ट के साथ साथ

दो वोट का अधिकार दिया था. जिसके तहट एक दलित वोटर अपनी कमिनिटी के कैंडिडेट के लिए एक अलग वोट देता था और साथ ही एक जनरल वोटर के रूप में भी वोट कर सकता था. हाला कि इस पूना पैक्ट में दलितों के लिए प्रोविंचियल लेजिस्लेचर्स में रिजर्व्ट सीट्स की संख्या को 71 से बढ़ा कर 147 कर दिया गया और सेंट्रल लेजिस्लेचर में कुल सीट्स 18% कर दी गई। लेकिन फिर भी समझवते के लिए अमबेटकर की अपने ही समाज में काफी आलोचना हुई। चुकी डॉक्टर बियार अमबेटकर एकनॉमिक्स में भी ज्यानी थे इसलिए उन्होंने रिजर्व्ट बैंक ओफ इंडिया की इस्टाबिश्मेंट में भी एक इंपोर्टेंट रोल प्ले किया। उन्होंने हिल्टन यंग कमिशन के सामने अपनी रिकमेंडेशन्स रखी जिसमें उन्होंने इंडियन एकोनॉमी के लिए एक सेंट्रल बैंक की इंपोर्टेंस और उसके फंक्शन्स पर इंडेप्ट अनेलिसिस को पेश की गई जिसे बाद में Reserve Bank of India Act 1934 के रूप में

कानूनी जामा पहनाया गया और 1st April 1935 को RBI Operational हो गई इस दोरान जब बाबा साहेब अम्बेटकर समाज की भेथरी के काम में लगे हुए थे तभी उनकी जिन्दगी में एक बड़ा भूचाल आ गया 1935 में बिमारी के चलते उनकी पतनी रमाबाई की मौत हो गई रमाबाई की मृत्यू पर बाबा साहेब फूट फूट कर रोय थे उन्होंने अपनी रमाबाई की मौत हो गई रमाबाई की मृत्यू पर बाबा साहे फूट फूट कर रोय थे उन्होंने अपनी किताब थॉट्स ओन पाकिस्तान को अपनी पतनी रमाबाई को समर्पित करते हुए लिखा था कि उन्हें मामूली भीमा से डॉक्टर अम्बेटकर बनाने का श्रे रमाबाई को जाता है

पतनी की मौत के बाद वो काफी अकेले पड़ गए लेकिन इसके बावजूद वो अपने काम में लगे रहे उन्होंने डिप्रेस क्लासिस के इंटरेस को सेफगार्ड करने के लिए इंडिपेंडिंट लेबर पार्टी की स्थापना की जिसने 1937 के सेंट्रल लेजिसलेटिव असेम्ली एलेक्शन्स में 15 सीटे जीती और उन्हें बॉंबे से मेंबर अफ द लेजिसलेटिव असेम्ली के रूप में चुरुवात हो गई। सरकार में रहते हुए उन्होंने वरकर्स की हालत सुधारने के लिए कई काम किये। साल 1942 में उन्होंने All India Scheduled Task Federation की स्थापना की जिसके बाद उन्हें 1942 में Member of the Viceroy’s Executive Council अपॉइंट किया गया।

जहां उन्होंने Minister of Labor के रूप में काम किया। इस पद पर रहते हुए अम्बेटकर कई Labor Reforms लेकर आये। उन�वंबर 1942 में नई दिल्ली में एवजित इंडियन लेबर कॉंफरिंस के सेविंट सेशन में वर्किंग आवर्ट्स को बारा घंटे से बदल कर आठ घंटे कर दिया ये देश भर के सभी वर्कर्स के लिए एक बहुत राहत भरा फैसला था इस दोरान देश और दुनिया एक एतिहासिक मोड पर खड़ी थी सेकिंड वर्ल्ड वार के चलते यूरोप की हालत खराब थी और इदर भारतिय नेताओं ने आजादी की लड़ाई छेड़ कर अंग्रेजों को भरत छोड़ने पर मजबूर कर दिया उनके कंदों पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौपी गई और उन्हें सेविन मेंबर्स क अम्बेटकर के तरकों को सुनकर हर कोई दांतों तले उंगली दबा लेता था। उन्होंने फंडमेंटल राइट्स पर भारतिय संविधान में काफी जोर दिया और एंशॉर किया कि कॉंसिटूशन में सभी सिटिजन्स को रिलोनॉमी हो लेकिन सेंटर गवर्मेंट इतनी स्ट्रॉंग रहे कि देश तुकडों में ना बट सके।

एमरजेंसी प्रोविशन्स, प्रेसिडेंट की शक्तिया, गवर्नर्ट सिस्टम ये सब उनके बैलेंसिंग विजन का हिस्सा थे। उनके कानूनी समझ, इंटिलेक्ट्वेलिटी और सोशल जस्टिस के प्रती सोचने उन्हें आगे चल कर फादर आफ दी इंडियन कॉंसिटूशन की उपाधी भी दिलाई। बियार अम्बेटकर ने कॉंसिटूशन में SCST के लिए कई इंपोर्टेंट कॉंसिटूशनल प्रोवीजन शामिल किये, जिनमें सबसे प्रमुक, जॉब्स और एजुकेशनल इंसिटूशन में रिजर्वेशन का प्रोवीजन था, ताकि उन्हें मेंस्ट्रीम में लाया जा सके। इसके अलावा उन्होंने लेजिस्लेचर्स में उनके लिए रिजर्वेशन आफ सीट्स अश्यौर किया, ताकि उन्हें पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन मिल सके। इसके साथ ही कॉंसिटूशन में आर्टिकल सेविंटीन को भी आट किया गया जिससे अंटचेबिलिटी एक पनिशिबल ओफिंस बन �होंने Constitution में महिलाओं के अधिकारों को भी जगह दी। उन्होंने महिलाओं को Equality, Education और Employment में बराबरी दिलाने के लिए कई कानून बनाए।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर नागरिक को समान अधिकार मिले चाहे उसका Religion, Caste, Language या Gender कोई भी हो। Right to Equality, Right to Freedom, Right against Exploitation जैसे Fundamental Rights का Framework लारचली उनकी सोच से ही निकला इस तरह वर्ल्ड की लारचस डेमोक्रेसी का संविधान बनाने का काम दो साल और ग्यारा महीने में पूरा हो गया और 26 नमेंबर 1949 को उसे कॉंसिट्विट असेम्बली से अप्रूवल मिल गया दो महीने बाद 26 जन्वरी 1950 को भारत का संविधान लागू हो गया जिसे हर साल रिपब्लिक डे के तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है ये डॉक्टर भीमरा अमबेडकर और उनकी कमिटी का ही कमाल था कि जहां भारत ने आजाद होने के केवल ढाईस साल में अपना कॉंसिटूशन बना लिया तो वही भारत से अलग हुए पाकिस्तान को अपना क॰ख दिया। देश के तिरंगे में अशोक चक्रो को शामिल करने में भी उनका योगदान था। आजाद भारत की पहली सरकार में वो मिनिस्टर ओफ लॉ बनाय गया।

1951 में उन्होंने पार्लियमेंट में हिंदू कोड बिल इंट्रिडूस किया लेकिन कई ऐसे मुद्दे थे जिन पर उनकी सरकार के साथ ज्यादा नहीं बनी और इसलिए इसी साल उन्होंने कैबिनेट से इस्तिफा दे दिया 1952 में देश में पहली बार लोगसभा चुनाव हुए जिसमें अम्बेडकर अपनी ही शेडूल कास फेडरेशन से चुनाव लड़े लेकिन कॉंग्रिस की लहर के कारण उन्हें अपने ही पर्सनल असिस्टेंट रहे नारायन ऐस काजरोलकर से हार का सामना करना पड़ा अम्बेडकर के लिए ये एक बड़ा जटका था क्योंकि दलित समुदाय का सबसे बड़ा चेहरा होने के बावजूद भी वो चौथे स्थान पर रहे। हाला कि इसके अगले ही साल वो राजसभा के जरिये फिर संसत पहुँच गए और अपने आखरी समय तक वो इसी सदन का हिस्सा रहे।

वो अपनी नीजी जिन्दगी को लेकर भी काफी चर्चाओं में रहे। पहली पतनी की मौत के कई साल बाद उन्होंने डॉक्टर शारदा कबीर नाम की एक ब्रहमिन महिला से शादी कर ली। उन्होंने 1935 में नासिक के येवला में एक जनसभा के दौरान कहा था कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूँ लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं। यही कारण था कि 14 ओक्टोबर 1956 को उन्होंने नाकपुर में अपनी दूसरी पतनी और अपने लगभग 3-4 लाग फॉलोवर्स के साथ हिंदूइजम को छोड़ कर बुद्धिजम को एक्सेप्ट कर लिया. अम्बेडकर को शुरू से ही किताबे पढ़ने का काफी शौक था. वो हर विशय पर किताबे पढ़ते थे. उन्हें 9 different languages की समझ थी, जिनमें हिंदी, पाली, संस्कृत, इंग्लिश, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, पर्शिन और गुजराती भाषा शामिल थी.

जिसमें पचास हजार से भी ज़्यादा किताबे मौचूत थी इसके अलावा उन्होंने अपनी जिन्दगी में दर्जनों किताबे लिखी जिनमें उनकी आखरी किताब दबुधा और इस धामा थी इस किताब को पूरा करने के महस तीन दिन बाद 6 डिसेंबर 1956 को दिल्ली में डॉक्टर भीमराव अमवेटकर की मृत्यू हो गई आज भी उनकी डेथ एनिवर्सी को पूरे देश में महापरी निर्वान देवस के रूप में मनाया जाता है 1990 में उन्हें मरनों परांथ भारत का सरवोच नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। डॉक्टर भीमराव अम्बेटकर का जीवन आज भी करोडों लोगों के लिए प्रेड़ना है। कभी दलित समाज से होने की वजह से समाज में भेदभाव का शिकार बने भीमराव अम्बेटकर ने ऐसा इतिहास रचा कि आज जब किसी के सर पर लाठी की चोट पड़ती है या किसी के अधिकार छीने जाते हैं तो सामने चाहे सरकार खुद क्यों ना हो।

एक आम नागरिक के लिए सम्विधान और उसके अधिकार उसकी ढाल बन कर खड़े होते हैं। अगर आपको ऐसे ही इंस्पिरेशनल लोगों की कहानी पसंद है तो आपको दुनिया के सबसे बड़े मैथेमेटीशिन श्री निवासर आमनुजन की कहानी जरूर पसंद आएगी। जिनके एक्स्ट्रॉर्डिनरी टैलेंट की वज़ोंे उन्हें दे मैन हो न्यू इंफिनिटी कहा जाता है। ।

Disclaimer:
यह लेख ऐतिहासिक स्रोतों, पुस्तकों और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। लेख का उद्देश्य किसी समुदाय, धर्म या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि इतिहास को तथ्यात्मक और शैक्षिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना है।

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