Jallianwala bagh नरसंहार 1919 भारतीय इतिहास की वह भयावह घटना है जिसने ब्रिटिश शासन के असली चेहरे को दुनिया के सामने उजागर कर दिया। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर का जलियांवाला बाग क्रूरता, अमानवीयता और सत्ता के अहंकार का प्रतीक बन गया। यह सिर्फ एक नरसंहार नहीं था, बल्कि भारत की आज़ादी की लड़ाई का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

🔹 रॉलेट एक्ट और ब्रिटिश दमन की पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट 1915 लागू किया, जिसके तहत भारतीयों के मौलिक अधिकार लगभग समाप्त कर दिए गए। युद्ध खत्म होने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि यह कानून हटेगा, लेकिन इसके उलट 1919 में रॉलेट एक्ट लागू कर दिया गया।
इस कानून के तहत:
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बिना सबूत गिरफ्तारी संभव थी
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बिना मुकदमे दो साल तक जेल
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प्रेस और सभाओं पर रोक
यही दमन जलियांवाला बाग नरसंहार 1919 की जमीन तैयार कर रहा था।
🔹 रॉलेट सत्याग्रह और पंजाब में उबाल
रॉलेट एक्ट के विरोध में महात्मा गांधी ने रॉलेट सत्याग्रह का आह्वान किया। देशभर में हड़तालें, प्रदर्शन और सभाएं होने लगीं।
पंजाब में इस आंदोलन का नेतृत्व डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल कर रहे थे। 10 अप्रैल 1919 को इन दोनों नेताओं की गिरफ्तारी से जनता का गुस्सा चरम पर पहुंच गया।
🔹 13 अप्रैल 1919: बैसाखी का खूनी दिन
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए। इनमें महिलाएं, बच्चे और ग्रामीण भी शामिल थे।
जलियांवाला बाग चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा था और बाहर निकलने का केवल एक संकरा रास्ता था।

🔹 जनरल डायर का आदेश
ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर लगभग 90 सशस्त्र सैनिकों के साथ वहां पहुंचा। उसने:
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बाग का मुख्य गेट बंद करवाया
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बिना चेतावनी दिए फायर का आदेश दिया
इसके बाद जलियांवाला बाग नरसंहार 1919 शुरू हुआ।
🔹 10 मिनट की अंधाधुंध गोलीबारी
लगभग 10 मिनट तक 1650 गोलियां चलाई गईं।
सैनिकों को आदेश था कि:
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जहां भीड़ ज्यादा हो, वहीं निशाना लगाया जाए
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भागने वालों को भी न छोड़ा जाए
लोग दीवारों से टकराकर गिरने लगे, कई कुएं में कूद गए। वह कुआं जल्द ही “मौत का कुआं” बन गया, जहां 100 से ज्यादा लोग दम घुटने से मारे गए।
🔹 मौत के बाद भी अमानवीयता
गोलियां तब रुकीं जब सैनिकों के पास कारतूस कम पड़ गए।
इसके बाद:
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घायलों को इलाज की अनुमति नहीं दी गई
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पूरी रात लाशें मैदान में पड़ी रहीं
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बिजली और पानी काट दिया गया
यह जलियांवाला बाग नरसंहार 1919 को और भी क्रूर बना देता है।
🔹 मौत का आंकड़ा और ब्रिटिश झूठ
ब्रिटिश सरकार ने दावा किया:
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379 मौतें
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1200 घायल
लेकिन स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार:
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1000+ लोग मारे गए
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2000 से अधिक घायल
ब्रिटिश शासन ने सच्चाई दबाने के लिए सेंसरशिप लगा दी, लेकिन सच देश-दुनिया तक पहुंच ही गया।
🔹 भारत और दुनिया की प्रतिक्रिया
इस नरसंहार ने पूरे भारत को झकझोर दिया:
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लोग नौकरियां छोड़ने लगे
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सम्मान और उपाधियां लौटाईं
रवींद्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड लौटाया।
गांधी जी ने कैसर-ए-हिंद त्याग दिया।
ब्रिटेन में भी इस घटना की आलोचना हुई।
विंस्टन चर्चिल ने इसे “Unutterably Monstrous” कहा।
🔹 हंटर कमीशन और अधूरा न्याय
1919 में हंटर कमीशन गठित हुआ।
कमीशन ने माना कि:
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डायर ने शक्ति का दुरुपयोग किया
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सभा शांतिपूर्ण थी
डायर को पद से हटाया गया, लेकिन कोई सजा नहीं दी गई। यही ब्रिटिश न्याय की सच्चाई थी।

🔹 क्रांति की चिंगारी
जलियांवाला बाग नरसंहार 1919 ने भारतीय युवाओं को क्रांति की राह पर धकेल दिया।
🔸 भगत सिंह
उस समय 12 साल के भगत सिंह ने:
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जलियांवाला बाग जाकर
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खून से सनी मिट्टी उठाई
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आज़ादी की कसम खाई
🔸 सरदार उधम सिंह
सरदार उधम सिंह ने 21 साल तक बदले की आग को सीने में जिंदा रखा।
13 मार्च 1940 को लंदन में उन्होंने माइकल ओ’डायर को गोली मारकर जलियांवाला बाग के शहीदों को न्याय दिलाया।
Jallianwala bagh का महत्व
1951 में यहां राष्ट्रीय स्मारक बनाया गया।
आज जलियांवाला बाग नरसंहार 1919 हमें याद दिलाता है कि:
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आज़ादी मुफ्त में नहीं मिली
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इसके पीछे अनगिनत बलिदान हैं
🔴 निष्कर्ष
जलियांवाला बाग नरसंहार 1919 भारतीय इतिहास का सबसे काला अध्याय है। यह घटना भय नहीं, बल्कि आज़ादी की आग बनकर उभरी। इसी आग ने अंततः 1947 में ब्रिटिश साम्राज्य को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।