17 Times a Small Kingdom
इतिहास में आपने मुगलों की जीत के अनगिनत किस्से सुने होंगे कि कैसे बाबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने एक-एक कर भारत की तमाम रियासतों को अपने कंट्रोल में कर लिया था।
लेकिन क्या आप उस साम्राज्य के बारे में जानते हैं जिसने मुगलों को एक-दो बार नहीं बल्कि पूरे 17 बार जंग के मैदान में धूल चटाई थी।
वह भी तब, जब उनकी सेना छोटी थी।
उनके पास कोई तोपखाना नहीं था, ना ही दिल्ली जैसे साम्राज्य की दौलत और रिसोर्सेज थे।
फिर भी उन्होंने अपने साहस, रणनीति और ज़मीन की समझ से उस एंपायर को झुका दिया, जिसे कभी कोई नहीं झुका सका।
17 Times a Small Kingdom the Empire That Defeated the Mughals 17 Times
वे गोरिल्ला युद्ध करते थे।
नदियों और पहाड़ियों को अपनी ढाल बनाते थे।
आधी रात में दुश्मनों पर हमला कर उनके काफिलों में खलबली मचा देते थे और सुबह होने से पहले घने जंगलों में ऐसे गायब हो जाते थे, जैसे कोई भूत हो।
यही कारण था कि मुगलों के बीच अफ़वाह फैल गई कि उनके ख़िलाफ़ कोई आम आदमी नहीं, बल्कि राक्षस और भूत युद्ध करते हैं।

वे इतने बड़े देशभक्त थे कि गद्दारी करने पर अपने सगे संबंधियों को भी मौत की सज़ा देने से नहीं हिचकते थे और अपनी जीत की खुशी अपने देवताओं के आगे दुश्मन की बलि देकर मनाते थे।
इतने महान योद्धा होने के बावजूद, इतिहासकारों ने उन्हें अपनी किताबों से मरहूम रखा।
लेकिन जब उनकी बहादुरी के किस्से सामने आए, तो पूरे भारत के लोग उनकी वीरता के आगे नतमस्तक हो गए।
भारत सरकार आज उनके एक सेनापति के जन्मदिन को लचित दिवस के रूप में सेलिब्रेट करती है।
यह कहानी है नॉर्थ ईस्ट इंडिया के रक्षक कहे जाने वाले अहोम डायनेस्टी और उनके वीर सेनापति लचित बोरफुकन की, जिनकी बहादुरी, निष्ठा और देशभक्ति के किस्से आज भी असम की मिट्टी में गूंजते हैं।
कहानी की शुरुआत साल 1215 से होती है, जब एक ताई प्रिंस चाउलंग सुखपा अपने 9,000 लोगों के साथ मोंग माओ से निकलकर भारत के नॉर्थ ईस्ट हिस्से में मौजूद ब्रह्मपुत्र वैली तक पहुँच जाते हैं।
सुखपा का इरादा यहाँ लूटपाट करने का नहीं, बल्कि असम में स्थायी रूप से बसने का था।
असम पहुँचने के बाद उन्होंने लोकल लोगों की ज़मीन पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा नहीं किया, बल्कि नई बस्तियाँ बसाईं।
उस समय असम में कमरूपा किंगडम का राज था, जिसका शासन साल 350 से लेकर 1140 तक चला।
इसके बाद यहाँ अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग ट्राइब्स का कंट्रोल हो गया था।

सुखपा दूरदर्शी नेता थे।
उन्होंने लोकल ट्राइब्स से युद्ध नहीं किया, बल्कि दोस्ती का रास्ता चुना।
उन्होंने कहा,
“हम मेहमान हैं और आप इस ज़मीन के मालिक हैं। आइए, एक-दूसरे को जानें और साथ रहें।”
इस बात का गहरा असर हुआ।
धीरे-धीरे लोकल ट्राइब्स उनके साथ जुड़ती चली गईं।
सुखपा खुद उन ट्राइब्स के बीच रहे।
उन्होंने उनकी भाषा सीखी, उनके रीति-रिवाजों का सम्मान किया और उनसे वैवाहिक संबंध भी स्थापित किए।
उन्होंने खुद खेती की और आम लोगों जैसा जीवन जिया।
यही कारण था कि उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया और लोग उन्हें अपने नेता के रूप में देखने लगे।
अगले कुछ वर्षों में सुखपा ने अलग-अलग इलाकों में अपनी बस्तियाँ बसाईं और हर जगह अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए।
कुछ ही समय में उन्होंने एक मजबूत प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था खड़ी कर ली।
इस तरह असम में अहोम किंगडम की स्थापना हुई।
यहीं से नॉर्थ ईस्ट इंडिया के इतिहास का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
1268 में सुखपा की मृत्यु के बाद असम पर कई अहोम राजाओं ने शासन किया।
इन सभी शासकों की खास बात यह थी कि उन्होंने भारत की संस्कृति को न तो बिगाड़ा और न ही बदला, बल्कि उसे खुले दिल से अपनाया।
उन्होंने हर धर्म और हर जाति का सम्मान किया और अलग-अलग समुदायों को एक साथ जोड़ा।
यही नीति अहोम साम्राज्य को एक मल्टी-एथनिक सोसाइटी में बदल देती है।
अहोम्स की सैन्य रणनीति भी बेमिसाल थी।
उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी को न सिर्फ प्राकृतिक रक्षा रेखा बनाया, बल्कि उसे एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
गोरिल्ला युद्ध और ज़मीन की समझ ने उनकी सेना को लगभग अजेय बना दिया।